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PPF क्या है? ₹500 से ₹1 करोड़ बनाने का सरकारी फॉर्मूला | 2026 की पूरी जानकारी

पीपीएफ क्या है? ₹500 से 1 करोड़ बनाने का सरकारी तरीका - मेरा 12 साल का एक्सपीरियंस पीपीएफ खाते से पहले ये पढ़ लो, बाकी बाद में पछताओगे   लास्ट अपडेट: 9 जुलाई 2026 | PPF ब्याज दर: 7.1% 📑 Table of Contents PPF क्या है? (Public Provident Fund की पूरी जानकारी) PPF का फुल फॉर्म क्या है? आसान भाषा में समझें PPF अकाउंट कौन खोल सकता है? (2026 के नए नियम) PPF Account खोलने के लिए जरूरी दस्तावेज PPF में ₹500 से ₹1.5 लाख तक निवेश के नियम PPF में पैसा जमा करने का सही समय और तरीका PPF Interest Rate 2026: मौजूदा ब्याज दर कितनी है? PPF में Compound Interest कैसे काम करता है? ₹500 महीना PPF में जमा करने पर कितना पैसा मिलेगा? ₹5,000 महीना PPF में निवेश करने पर रिटर्न ₹12,500 महीना जमा करके PPF से ₹1 करोड़ कैसे बनाएं? PPF के 5 सबसे बड़े फायदे PPF का EEE Tax Benefit क्या है? PPF पर Loan और Partial Withdrawal के नियम PPF की 3 कमियां जो निवेश से पहले जाननी चाहिए PPF vs FD vs SIP vs Mutual Fund – कौन बेहतर है? PPF Account Online और Offline कैसे खोलें? PPF में निवेश ...

घर बैठे डिजिटल मार्केटिंग, ई-कॉमर्स, रियल एस्टेट और यूट्यूब से ₹70,000 – ₹10 लाख कमाई | 2026

डिजिटल मार्केटिंग एजेंसी: कम निवेश में नोट छापने की मशीन, जानिए कैसे शुरू करें अपना खुद का ऑनलाइन बिजनेस

प्रकाशित: 01 अप्रैल, 2026 | 🔄अंतिम अद्यतन: 06 अप्रैल, 2026 (07:30 पूर्वाह्न)

🚀2026 अर्निंग रिपोर्ट: कमाई का महागणित
बिज़नेस का नाम प्रारंभिक निवेश मुख्य व्यापारी (हुनर) मासिक शुद्ध लाभ आरपीस्क लेवल
डिजिटल मार्केटिंग बहुत कम (₹10k-20k) विज्ञापन और एसईओ ₹70,000 - ₹10 लाख 🟢 बहुत कम
ई-कॉमर्स (अमेज़ॅन) मध्यम (₹50k+) उत्पाद निर्माण सिल ₹1.6 लाख - ₹8 लाख 🟡 मध्यम
रियल एस्टेट ब्रोकर शून्य (₹0) नेटवर्किंग/बातचीत ₹2 लाख - ₹5 लाख 🟢 बहुत कम
यूट्यूब (यूट्यूब) शून्य (₹0) वीडियो और कहानी ₹1.5 लाख - ₹3.5 लाख+ 🟡 मध्यम
अन्य व्यवसाय उच्च (गाड़ी की ईएमआई) ऍम ₹26,000 - ₹1.25 लाख 🔴 उच्च
© 2026 ukgrank.blogspot.com | विशेष अनुसंधान रिपोर्ट

नई दिल्ली/मुंबई: आज के दौर में अगर आपके पास बिजनेस इंटरनेट नहीं है, तो समझ लें कि उसने बिजनेस रेस्ट से बाहर भुगतान किया है। पहले के समय में लोग शॉपिंग मॉल में खरीदारी का इंतजार करते थे, लेकिन आज जमाना बदल गया है। अब ग्राहक दुकान तक नहीं जाता, बल्कि दुकान पर खुद ग्राहक के मोबाइल तक का स्टोर होता है। इसी ज़रूरत ने एक ऐसे व्यापार को जन्म दिया है जिसे हम 'डिजिटल मार्केटिंग एजेंसी' कहते हैं। सरल शब्दों में कहा गया है, किसी भी कंपनी के सामान या सेवा को फेसबुक, ग्राफिक्स, गूगल और यूट्यूब के माध्यम से लोगों तक पहुंचाना और उनकी बिक्री की सुविधा ही डिजिटल मार्केटिंग है। इस काम की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसे शुरू करने के लिए आपको किसी भी पर्यटक या करोड़ों रुपये के डॉक्टर की जरूरत नहीं है। अगर आपके पास एक लैपटॉप, इंटरनेट कनेक्शन और थोड़ा सा दिमाग है, तो आप घर बैठे महीने के 50 हजार से लेकर 5 लाख रुपये तक आसानी से कमा सकते हैं। अक्सर लोग मेरे दोस्त हैं कि भाई, ये काम तो अनपढ़ आदमी को समझ नहीं आता, तो मैं कहता हूं कि इसे एक उदाहरण से समझिए। जैसे पुराने जमाने में गांव के नोटिफिकेशन पर मुनादी करने वाला ढोल बजाकर साहब ने खबर दी थी, बस वही काम आज मोबाइल की स्क्रीन पर नोटिफिकेशन के जरिए होता है। Google पर जब आप कुछ करते हैं, तो जो पहले नंबर पर दिखता है, उसे वहां तक ​​पेंसिल का काम एक डिजिटल मार्केटिंग एजेंसी सर्च ही करती है।

​अब बात करते हैं इसके काम करने के तरीके की जिसे चार बड़े हिस्सों में बांटा जा सकता है। पहला है SEO (सर्च इंजन ऑप्टिमाइजेशन), जिसका मतलब है कि जब कोई गूगल पर लिखे 'सबसे बढ़िया जूते', तो आपकी क्लाइंट की दुकान का नाम सबसे ऊपर आए। दूसरा है Social Media Management, यानी फेसबुक और इंस्टाग्राम पर सुंदर फोटो और वीडियो डालकर ग्राहकों को लुभाना। तीसरा है Ads (विज्ञापन), जिसमें आप गूगल या फेसबुक को थोड़े पैसे देकर लाखों लोगों तक अपनी बात पहुंचाते हैं। और चौथा है Content Writing, यानी वह भाषा और शब्द जो ग्राहक को सामान खरीदने पर मजबूर कर दें। इन चारों चीजों को सीखने के लिए आपको किसी बड़ी डिग्री की जरूरत नहीं है, बल्कि यूट्यूब पर मौजूद फ्री वीडियो से भी आप महारत हासिल कर सकते हैं। यूट्यूब एक ऐसा खजाना है जहां से आप विज्ञापन चलाने की बारीकियां मुफ्त में सीख सकते हैं। कई लोग डरते हैं कि क्या हमें कोडिंग आनी चाहिए? बिल्कुल नहीं। आज के समय में वेबसाइट बनाना उतना ही आसान है जितना फेसबुक पर फोटो डालना। आप wardpeersh जैसी वेबसाइट का इस्तेमाल करके बिना किसी तकनीकी ज्ञान के शानदार वेबसाइट तैयार कर सकते हैं और अपने क्लाइंट्स को सर्विस दे सकते हैं।

​चलिए अब असली बात पर आते हैं—कमाई का गणित। इसे बिल्कुल "देसी और आसान" हिसाब से समझते हैं। मान लीजिए आपने अपनी एजेंसी शुरू की और आपको केवल 5 छोटे क्लाइंट मिले। ये क्लाइंट आपके शहर का कोई बड़ा जिम, एक नामी हॉस्पिटल, एक स्कूल, एक ज्वेलरी शॉप और एक प्रॉपर्टी डीलर हो सकते हैं। अगर आप एक क्लाइंट से सोशल मीडिया मैनेजमेंट और थोड़े से विज्ञापन चलाने के मात्र 15,000 रुपये महीना भी चार्ज करते हैं, तो 5 क्लाइंट से आपकी सीधी कमाई 75,000 रुपये महीना हो गई। अब इसमें से अगर आप 5,000 रुपये का खर्चा निकाल दें (जैसे इंटरनेट और बिजली), तो भी आपके पास 70,000 रुपये शुद्ध मुनाफा बचता है। जैसे-जैसे आपकी एजेंसी पुरानी होती जाती है और आप बड़े क्लाइंट पकड़ते हैं, वैसे-वैसे यह फीस बढ़ती जाती है। एक बड़ी एजेंसी एक-एक क्लाइंट से 1 लाख रुपये महीना तक चार्ज करती है। अगर आपके पास सिर्फ 10 ऐसे क्लाइंट हो जाएं, तो आपकी महीने की कमाई 10 लाख रुपये तक पहुंच सकती है। फैशबुक पर विज्ञापन चलाना सीखना आपके लिए सोने की खान साबित हो सकता है क्योंकि हर छोटा दुकानदार आज चाहता है कि उसके इलाके के लोगों को उसका विज्ञापन दिखे।

​डिजिटल मार्केटिंग का मार्केट इतना बड़ा क्यों है, इसे एक छोटे से उदाहरण से समझिए। मान लीजिए लखनऊ के हजरतगंज में किसी की साड़ियों की दुकान है। अब उस दुकान पर वही लोग आएंगे जो वहां से गुजरेंगे। लेकिन अगर वह दुकानदार डिजिटल मार्केटिंग का सहारा ले, तो पूरे उत्तर प्रदेश की महिलाएं उसके डिजाइन्स देख सकती हैं और घर बैठे ऑर्डर कर सकती हैं। यही वजह है कि आज हर बिजनेस अपनी मार्केटिंग का बजट अखबार और टीवी से हटाकर डिजिटल की तरफ ले जा रहा है। अगर आप इंस्टाग्राम पर अच्छे रील्स बनाना जानते हैं, तो आप कंपनियों के लिए 'इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग' भी कर सकते हैं। इसमें कंपनियां आपको उनके प्रोडक्ट का प्रचार करने के लिए मोटे पैसे देती हैं। कई लोग सवाल करते हैं कि हमें पहला क्लाइंट कैसे मिलेगा? इसका सीधा रास्ता है—अपने आसपास के दुकानदारों से बात करें। उन्हें दिखाएं कि कैसे उनके प्रतिद्वंदी ऑनलाइन विज्ञापन देकर उनसे आगे निकल रहे हैं। जब आप उन्हें 15 दिन का 'फ्री ट्रायल' देंगे और उनके पास नए ग्राहक आने लगेंगे, तो वे खुशी-खुशी आपको पैसा देंगे।





ई-कॉमर्स का असली खेल: घर बैठे अमेज़न और फ्लिपकार्ट पर दुकान खोलकर कैसे बनें करोड़पति, जानिए कमाई का पूरा गणित

नई दिल्ली/बेंगलुरु: आज के डिजिटल दौर में अगर आप अभी भी इस बात का इंतजार कर रहे हैं कि ग्राहक आपकी दुकान की सीढ़ियां चढ़कर आएगा, तो आप बहुत बड़ी गलतफहमी में हैं। अब दुकान ग्राहक के पास नहीं, बल्कि ग्राहक की जेब में रखे मोबाइल के अंदर समा गई है। इसे ही हम ई-कॉमर्स बिजनेस कहते हैं। सीधे और सरल शब्दों में कहें तो अपना सामान इंटरनेट के जरिए ऑनलाइन बेचना ही ई-कॉमर्स है। अब आप सोच रहे होंगे कि भाई, हम तो छोटे से शहर में रहते हैं, हम भला पूरी दुनिया को सामान कैसे बेच सकते हैं? तो इसका जवाब है अमेजॉन और filfcard जैसी बड़ी कंपनियां। ये वेबसाइट्स आपको एक ऐसा प्लेटफॉर्म देती हैं जहाँ आप अपना रजिस्ट्रेशन करके एक 'सेलर' बन जाते हैं और फिर आपका सामान कन्याकुमारी से लेकर कश्मीर तक का कोई भी व्यक्ति खरीद सकता है। ई-कॉमर्स बिजनेस शुरू करने के दो मुख्य तरीके हैं—पहला है 'अपना खुद का प्रोडक्ट बनाना' और दूसरा है 'रीसेलिंग' यानी कहीं से सस्ता माल उठाकर उसे मुनाफे के साथ ऑनलाइन बेचना। कई लोग मुझसे पूछते हैं कि क्या इसके लिए बहुत पढ़ाई-लिखाई चाहिए? तो मैं कहता हूं कि अगर आप मोबाइल पर व्हाट्सएप चलाना जानते हैं और आपको हिसाब-किताब की बेसिक समझ है, तो आप इस बिजनेस के बेताज बादशाह बन सकते हैं। इसमें सबसे बड़ा फायदा यह है कि आपको किसी प्राइम लोकेशन पर लाखों की दुकान किराये पर नहीं लेनी पड़ती, आपका गोदाम आपका अपना कमरा भी हो सकता है।

​अब बात करते हैं उस 'जादुई तरीके' की जिसे हम 'सही प्रोडक्ट की खोज' कहते हैं। ई-कॉमर्स में सारा खेल प्रोडक्ट के चुनाव का है। मान लीजिए आपके इलाके में मिट्टी के बर्तन बहुत अच्छे मिलते हैं या फिर आपके यहाँ कोई खास तरह का अचार बनता है जो शहर में मशहूर है। अगर आप इसी अचार को कांच की सुंदर बरनी में पैक करके meeso पर लिस्ट कर देते हैं, तो जो अचार आप गांव में 100 रुपये का बेच रहे थे, वह ऑनलाइन 300 से 400 रुपये में आसानी से बिक जाता है। इसे ही वैल्यू एडिशन कहते हैं। अगर आपके पास खुद का कोई सामान नहीं है, तो आप दिल्ली के सदर बाजार या सूरत के कपड़ा मार्केट जैसे थोक बाजारों से सस्ता माल उठा सकते हैं। आप indiamart पर जाकर देशभर के थोक विक्रेताओं (Wholesalers) से संपर्क कर सकते हैं और उनसे सीधा माल मंगवाकर अपनी ऑनलाइन दुकान सजा सकते हैं। कई लोग अपनी खुद की ब्रांडेड वेबसाइट बनाना चाहते हैं, जिसके लिए  Shopify दुनिया का सबसे बेहतरीन जरिया है। यहाँ आप बिना किसी टेक्निकल जानकारी के अपनी खुद की एक प्रोफेशनल दिखने वाली ऑनलाइन दुकान खोल सकते हैं और फेसबुक-इंस्टाग्राम पर विज्ञापन चलाकर सीधे ग्राहकों को माल बेच सकते हैं।

​चलिए अब उस गणित को समझते हैं जिसका आप बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं—कमाई का कैलकुलेशन। अब जरा इस गणित को मेरी नजर से देखो, क्योंकि कागज पर मुनाफा लिखना और जेब में पैसा आना—दोनों में जमीन-आसमान का फर्क है। 10 साल से इस ई-कॉमर्स की रग-रग से वाकिफ होने के नाते बता रहा हूं, असली 'मक्खन' कहाँ छुपता है और 'चूना' कहाँ लगता है, इसे समझो।

​मान लो तुमने दिल्ली के सदर बाजार या गफ्फार मार्केट से एक 'पोर्टेबल जूसर' उठाया। थोक में ये तुम्हें पड़ा ₹200 का। तुमने जोश-जोश में अमेज़न पर इसकी कीमत डाल दी ₹699। अब दूर से देखने वाले को लगेगा कि भाई ₹500 का सीधा मुनाफा है, पर यहीं पर नया बंदा मात खा जाता है। अब असली हिसाब शुरू होता है—अमेज़न अपनी 'रेफरल फीस' और 'क्लोजिंग फीस' के नाम पर करीब ₹70-80 काट लेगा, फिर डिलीवरी वाला जो डब्बा आपके घर से उठाकर ग्राहक तक ले जाएगा, उसका ₹60-70 अलग से जाएगा। यानी करीब ₹150 तो सीधा प्लेटफार्म और कुरियर ले गए।

​अभी कहानी खत्म नहीं हुई है! उस जूसर को सुरक्षित भेजने के लिए बढ़िया बबल-रैप और गत्ते का डब्बा लगेगा, जिसकी पैकिंग में तुम्हारे ₹20 खर्च होंगे। और भाई, आज के समय में अमेज़न के समंदर में तुम्हारा प्रोडक्ट कोई कैसे ढूंढेगा? उसके लिए तुम्हें विज्ञापन (Ads) चलाने पड़ेंगे। अगर मान लें एक ऑर्डर लाने के लिए तुमने ₹50 विज्ञापन पर फूंके, तो अब तुम्हारा कुल खर्चा जोड़ो: ₹200 (माल) + ₹150 (अमेज़न फीस/शिपिंग) + ₹20 (पैकिंग) + ₹50 (विज्ञापन) = ₹420।

​अब ₹699 में से ₹420 घटाओ, तो एक पीस पर तुम्हारे हाथ में आए ₹279। इसे कहते हैं 'नेट प्रॉफिट'। अब मजे की बात सुनो—अगर तुमने अपनी मेहनत और बढ़िया फोटो के दम पर दिन के सिर्फ 20 ऑर्डर भी सेट कर लिए, तो रोज के ₹5,580 तुम्हारी जेब में पक्के हैं। महीने का हिसाब लगाओगे तो ये ₹1,67,400 बैठता है।

​लेकिन, यहाँ एक बड़ा 'कैच' (Catch) है जिसे हम एक्सपीरियंस वाले जानते हैं—'रिटर्न' (Returns)। ई-कॉमर्स में 10-15% माल वापस आता है। कोई कहता है "पसंद नहीं आया", कोई कहता है "चला नहीं"। जब माल वापस आता है, तो आने-जाने का भाड़ा तुम्हारी जेब से जाता है। इसलिए हमेशा अपने मुनाफे में से थोड़ा हिस्सा 'रिटर्न' के लिए बचाकर रखो।

​असली धमाका तब होता है जब तुम्हारा प्रोडक्ट 'Bestseller' बन जाता है। तब तुम्हें विज्ञापन पर पैसे खर्च नहीं करने पड़ते, लोग खुद तुम्हें ढूंढते हुए आते हैं। उस वक्त अगर दिन के 100 ऑर्डर आने लगे, तो भाई महीने का ₹8 से ₹9 लाख कमाना कोई रॉकेट साइंस नहीं है। मैंने खुद ऐसे लड़के देखे हैं जो घर के एक कोने से शुरू हुए और आज उनका अपना बड़ा वेयरहाउस है।



​लेकिन इस बिजनेस में एक सबसे जरूरी बात है—'कस्टमर का भरोसा'। ऑनलाइन दुनिया में आपकी दुकान की इज्जत आपकी 'रेटिंग' और 'रिव्यू' पर टिकी होती है। अगर आपका सामान अच्छा है और लोग उसकी तारीफ कर रहे हैं, तो  google पर सर्च करने पर आपका प्रोडक्ट खुद-ब-खुद ऊपर आने लगेगा। ई-कॉमर्स में एक और मॉडल बहुत मशहूर है जिसे 'ड्रॉपशिपिंग' कहते हैं। इसमें तो आपको सामान खरीदने की भी जरूरत नहीं पड़ती। जब ग्राहक आपकी वेबसाइट पर ऑर्डर देता है, तो आप पीछे से सप्लायर को बोल देते हैं और वह सीधा सामान ग्राहक के घर पहुंचा देता है। आप अपना मुनाफा बीच में ही रख लेते हैं। इसके लिए आप  aliexpress या भारतीय सप्लायर्स की मदद ले सकते हैं। हालांकि, भारत में खुद का स्टॉक रखकर बेचना ज्यादा भरोसेमंद माना जाता है। आपको बस एक GST नंबर लेना होगा और बैंक में एक करंट अकाउंट खुलवाना होगा, जिसके बाद आप बिजनेस के लिए तैयार हैं। पेमेंट के लिए आप  rozorpay जैसे गेटवे का इस्तेमाल कर सकते हैं ताकि ग्राहक आपको कार्ड या UPI से पैसा भेज सके।






रियल एस्टेट का असली धंधा: मिट्टी से सोना बनाने का हुनर, जानिए कैसे एक डील आपको रातों-रात लखपति बना सकती है

नई दिल्ली/लखनऊ: भाई देखो, सीधी सी बात है, दुनिया में चाहे मंदी आए या तेजी, इंसान को रहने के लिए छत और पैर टिकाने के लिए जमीन हमेशा चाहिए होगी। आज हम बात कर रहे हैं उस धंधे की जिसे 'रियल एस्टेट' कहते हैं, पर अपनी देसी भाषा में इसे 'प्रॉपर्टी का काम' या 'जमीनी सौदा' कहा जाता है। बहुत से लोग समझते हैं कि इस काम के लिए करोड़ों रुपये चाहिए, लेकिन सच तो ये है कि अगर आपकी जुबान में दम है और आपके पास लोगों का भरोसा है, तो आप बिना एक पैसा लगाए भी इस मार्केट के राजा बन सकते हैं। 10 साल से इस बाजार की धूल फांकने के बाद एक बात समझ गया हूं—प्रॉपर्टी का काम सिर्फ ईंट-पत्थर का नहीं, बल्कि भरोसे का सौदा है।  99acres जैसी वेबसाइट्स पर आज लाखों लोग घर ढूंढ रहे हैं, पर उन्हें चाहिए एक ऐसा बंदा जो उन्हें सही और साफ-सुथरी जमीन दिलवा सके। अगर आप वो बंदा बन गए, तो समझो आपकी चांदी ही चांदी है। इस काम में पैसा इतना है कि आपकी एक महीने की मेहनत साल भर की कमाई निकाल सकती है।

​अब जरा ध्यान से समझो, ये खेल चलता कैसे है। इसमें तीन तरह के काम होते हैं—पहला है 'ब्रोकरेज' यानी दलाली, दूसरा है 'किराये का काम' (Rentals), और तीसरा है 'प्लॉटिंग'। दलाली में आपको बस एक बेचने वाले को ढूंढना है और एक खरीदने वाले को। मान लीजिए, आपके मोहल्ले में किसी को अपना मकान बेचना है जिसकी कीमत 50 लाख रुपये है। अब आपने अपने संपर्कों या  magicbricks के जरिए एक खरीदार ढूंढ निकाला। आमतौर पर इस धंधे में 1% से 2% का कमीशन दोनों तरफ से मिलता है। अब गणित लगाओ—50 लाख का 2% हुआ 1 लाख रुपये बेचने वाले से और 1 लाख खरीदने वाले से। यानी एक सिंगल डील और आपकी जेब में सीधा 2 लाख रुपये! क्या कोई और ऐसी नौकरी है जो आपको एक महीने में इतनी मोटी रकम दे दे? बिल्कुल नहीं। बस शर्त इतनी है कि आपको जमीन के कागज चेक करना और खरीदार का मन पढ़ना आना चाहिए।

​बात करें किराये के काम की, तो ये आपके "रोज के खर्चे" निकालने का सबसे बढ़िया जरिया है। बड़े शहरों में लोग हर रोज घर बदलते हैं। आपको बस मकान मालिकों से अच्छे रिश्ते बनाने हैं। जैसे ही कोई फ्लैट खाली हो, आप उसकी फोटो खींचकर  housing पर डाल दें। जैसे ही कोई किरायेदार उस घर को फाइनल करता है, आपको एक महीने का किराया बतौर कमीशन मिलता है। अगर आपने महीने में सिर्फ 5 फ्लैट भी किराये पर चढ़वा दिए और हर फ्लैट का किराया 20,000 रुपये है, तो बैठे-बिठाए 1 लाख रुपये महीना तो कहीं नहीं गया। और सबसे मजे की बात? इसमें आपकी जेब से एक रुपया भी खर्च नहीं हो रहा, बस आपकी मेहनत और बातचीत करने का तरीका ही आपकी पूंजी है।

​अब आते हैं उस खेल पर जहाँ असली मोटा पैसा है—'प्लॉटिंग और इन्वेस्टमेंट'। इसे एक मिसाल से समझिए। मान लीजिए शहर के बाहर कोई नई सड़क या हाईवे निकल रहा है। वहां आज जमीन सस्ती है। आपने अपने कुछ जान पहचान के लोगों को इकट्ठा किया और वहां एक बीघा जमीन दिलवा दी। दो-तीन साल बाद जैसे ही वहां बिजली-पानी पहुंचा, उस जमीन की कीमत दोगुनी-तिगुनी हो गई। इस बीच में जो आपने 'प्रॉफिट शेयरिंग' की डील की होगी, वो आपको सीधा लखपति से करोड़पति बना सकती है। लोग आज  nobroker जैसी साइट्स पर बिना बिचौलिये के काम करना चाहते हैं, लेकिन सच तो ये है कि जमीन के पेचीदा कागजों और कानूनी कार्रवाई को समझने के लिए इंसान को एक लोकल एक्सपर्ट की जरूरत हमेशा रहती है। वही एक्सपर्ट आपको बनना है।

​लेकिन भाई, इस चमक-धमक के पीछे की हकीकत भी जान लो। ये काम जितना आसान दिखता है, उतना है नहीं। इसमें कभी-कभी 3-3 महीने तक एक भी डील नहीं होती। आपको अपना हौसला बनाए रखना पड़ता है। मार्केट में बहुत से लोग आपको 'भू-माफिया' या 'दलाल' कहकर छोटा आंकने की कोशिश करेंगे, पर आपको एक प्रोफेशनल की तरह काम करना है। हमेशा याद रखो, जमीन के सौदे में 'कागज' ही खुदा होता है। कभी भी किसी विवादित जमीन में हाथ न डालें, नहीं तो एक गलत सौदा आपके सालों के बनाए भरोसे को मिट्टी में मिला सकता है। आप  realtor पर जाकर देख सकते हैं कि दुनिया भर में लोग किस तरह प्रोफेशनल तरीके से ये काम कर रहे हैं। आपको भी वही तरीका अपनाना होगा—साफ बात, पक्की लिखा-पढ़ी और ईमानदारी।

​कमाई की बात करें तो इसकी कोई सीमा नहीं है। एक छोटा एजेंट भी अगर साल में 4-5 बड़ी डील क्लोज कर ले, तो वह साल के 10 से 15 लाख रुपये आराम से कमा लेता है। और अगर आप बड़े बिल्डरों के साथ जुड़ गए, तो कमीशन के साथ-साथ आपको कई तरह के इंसेंटिव भी मिलते हैं। आज के समय में सोशल मीडिया और व्हाट्सएप ग्रुप्स का इस्तेमाल करके आप अपनी प्रॉपर्टी की जानकारी हजारों लोगों तक पहुंचा सकते हैं।  ओएलएक्स के 'रियल एस्टेट' सेक्शन में जाकर देखो, वहां हर मिनट एक नया विज्ञापन डलता है। मतलब डिमांड बहुत है, बस सप्लाई करने वाला चाहिए। अगर आप में लोगों से बात करने का हुनर है और आप धूप-पसीने में सड़कों पर घूमने का दम रखते हैं, तो यकीन मानिए रियल एस्टेट से बढ़िया कोई बिजनेस नहीं है।






यूट्यूब से पैसा छापने का असली फंडा: कैमरा उठाओ और बन जाओ अपने शहर के स्टार, जानिए कैसे एक वीडियो बदल सकता है आपकी किस्मत

नई दिल्ली/लखनऊ: भाई देखो, आज के जमाने में अगर तुम्हारे पास एक स्मार्टफ़ोन है और उसमें इंटरनेट चल रहा है, तो समझ लो तुम एक चलती-फिरती टीवी चैनल के मालिक बन सकते हो। 10 साल से इस इंटरनेट की दुनिया को करीब से देखने के बाद एक बात दावे के साथ कह सकता हूँ—यूट्यूब (YouTube) आज के दौर का वो कुआँ है जहाँ से जितना चाहो उतना पैसा निकाल सकते हो। लोग मुझसे पूछते हैं कि भाई, क्या इसके लिए बहुत पढ़ा-लिखा होना जरूरी है? तो मेरा जवाब होता है—बिल्कुल नहीं! आपने वो 'कच्चा बादाम' या 'बचपन का प्यार' वाला लड़का देखा है? क्या उन्होंने कोई डिग्री ली थी? नहीं न! बस एक वीडियो बनाया, लोगों को पसंद आया और उनकी जिंदगी बदल गई। यूट्यूब पर आज हर वो इंसान कामयाब है जिसके पास दिखाने को कोई हुनर है या बताने को कोई दिलचस्प कहानी। चाहे आप खाना अच्छा बनाते हों, खेती की जानकारी रखते हों, या बस लोगों को हंसाना जानते हों—यूट्यूब पर हर किसी के लिए जगह है।

​अब जरा ध्यान से समझो, ये खेल शुरू कैसे होता है। सबसे पहले आपको अपने मोबाइल में एक 'चैनल' बनाना पड़ता है। ये उतना ही आसान है जितना फेसबुक पर अपनी फोटो डालना। असली मेहनत शुरू होती है 'कंटेंट' यानी वीडियो बनाने में। अब यहाँ पर एक बात गाँठ बाँध लो—शुरू में आपके पास बड़े कैमरे या माइक नहीं हैं, तो कोई बात नहीं। आजकल के मोबाइल के कैमरे ही काफी हैं। बस आपकी आवाज साफ होनी चाहिए और जो आप दिखा रहे हैं, उसमें दम होना चाहिए। लोग आज इंस्टाग्राम पर छोटी-छोटी रील्स देखकर बोर हो जाते हैं, तब वो यूट्यूब पर आते हैं कुछ नया और विस्तार से सीखने के लिए। अगर आप राजमिस्त्री हैं, तो दीवार कैसे सीधी खड़ी करते हैं, इसका वीडियो बनाइए। अगर आप टेलर हैं, तो सूट की कटिंग सिखाना शुरू कीजिए। यकीन मानिए, दुनिया भर में लोग ये सब सीखने के लिए तड़प रहे हैं।

​अब आते हैं सबसे जरूरी सवाल पर—भाई, इसमें पैसा कैसे आता है? देखो, यूट्यूब से कमाई के तीन मुख्य रास्ते हैं। पहला है 'Ads' यानी विज्ञापन। जब आपका चैनल थोड़ा बड़ा हो जाता है (1000 सब्सक्राइबर और 4000 घंटे का वॉच टाइम), तब गूगल आपके वीडियो पर छोटे-छोटे विज्ञापन दिखाने लगता है। जैसे ही कोई वो विज्ञापन देखता है, आपके अकाउंट में डॉलर आने शुरू हो जाते हैं। दूसरा रास्ता है 'Sponsorship'—जब आप मशहूर हो जाते हैं, तो कंपनियाँ आपको अपने सामान का प्रचार करने के लिए खुद पैसे देती हैं। जैसे आपने देखा होगा, वीडियो के बीच में कोई कहता है कि "ये ऐप डाउनलोड करो", बस वही स्पॉन्सरशिप है। और तीसरा रास्ता है 'Affiliate Marketing'—जिसमें आप  Amazon के किसी सामान का लिंक अपने वीडियो के नीचे डाल देते हैं। अगर कोई उस लिंक से सामान खरीदता है, तो आपको घर बैठे कमीशन मिलता है।

अब जरा इस गणित को बिल्कुल 'देसी' तरीके से दिमाग में उतारो। मान लो, तुमने एक वीडियो बनाया और किस्मत ने साथ दिया, उस पर 10 लाख (1 Million) लोग आ गए। अब लोग पूछते हैं—"भाई, क्या रातों-रात लखपति बन गए?" तो सुनो, इंडिया में अगर तुम्हारा चैनल साधारण है (जैसे कॉमेडी या ब्लॉग), तो 10 लाख व्यूज पर यूट्यूब तुम्हें लगभग ₹30,000 से ₹40,000 देगा। लेकिन, अगर तुम 'पैसे कमाने' या 'बिजनेस' की बात बता रहे हो, तो यही रकम ₹70,000 तक भी जा सकती है। इसे कहते हैं 'RPM' का खेल, यानी विज्ञापन देने वाले को तुम्हारा वीडियो कितना कीमती लगा।

​अब असली मज़ा देखो—अगर तुमने महीने में सिर्फ 4 ऐसे जानदार वीडियो डाल दिए, तो सिर्फ विज्ञापन-विज्ञापन से तुम्हारे घर में ₹1.5 लाख से ₹2 लाख आराम से आ गए। पर भाई, ये तो सिर्फ 'ट्रेलर' है, असली फिल्म तो 'स्पॉन्सरशिप' (Sponsorship) में है!

​जब तुम्हारे वीडियो पर 10 लाख लोग आ रहे हैं, तो बड़ी-बड़ी कंपनियां तुम्हारे पीछे भागेंगी। वो कहेंगी—"भाई, बस 30 सेकंड हमारे इस तेल या ऐप के बारे में बोल दो।" एक 10 लाख व्यूज वाले वीडियो के लिए एक छोटी कंपनी भी तुम्हें ₹50,000 से ₹1 लाख हंसते-हंसते दे देगी। अब सोचो, महीने में दो बार भी तुमने किसी का प्रचार कर दिया, तो ₹1.5 लाख वहां से आ गए।

​तो कुल जमा-पूंजी कितनी हुई? ₹2 लाख विज्ञापन के + ₹1.5 लाख प्रचार के = ₹3.5 लाख महीना! अब मुझे बताओ, कौन सा कलेक्टर या बड़ा अफसर एक महीने में इतना सफेद पैसा घर ले जाता है? और ये तो मैं छोटे लेवल की बात कर रहा हूँ। जो बड़े खिलाड़ी हैं, वो तो एक वीडियो का ₹10-20 लाख सिर्फ प्रचार का लेते हैं।

​पर रुको, यहाँ एक 'पेंच' है जो कोई नहीं बताता। ये पैसा सीधा हाथ में नहीं आता। इसमें से तुम्हें इंटरनेट का खर्चा, एक अच्छा मोबाइल या कैमरा, और शायद एक लड़का जो वीडियो एडिट करे, उसका खर्चा निकालना होगा। सबसे बड़ी बात—यूट्यूब अपनी कमाई का 45% हिस्सा खुद रख लेता है, जो तुम्हें दिखता है वो काट-पीट कर ही आता है।

​एक और हकीकत जान लो—आज 10 लाख व्यूज आए हैं, तो जरूरी नहीं कि कल भी आएंगे। कभी-कभी चैनल 'ठंडा' भी पड़ जाता है। इसीलिए असली समझदार वही है जो इस पैसे को फालतू उड़ाने के बजाय सही जगह निवेश करे।


​लेकिन भाई, अब थोड़ा जमीनी सच (Reality) भी सुन लो। यूट्यूब पर रातों-रात अमीर नहीं बना जाता। शुरू के 6 महीने या साल भर शायद आपको एक रुपया भी न मिले। आपको खाली दीवार के सामने बोलना पड़ेगा, लोग आपका मजाक उड़ाएंगे, कहेंगे "देखो हीरो बन रहा है"। लेकिन आपको रुकना नहीं है। ये धंधा आपसे 'सब्र' (Patience) मांगता है। जो बंदा टिक गया, वो जीत गया। आपको वीडियो एडिटिंग सीखनी पड़ेगी, जिसके लिए आप  कैनवा जैसी वेबसाइट का इस्तेमाल करके सुंदर थंबनेल बना सकते हैं। थंबनेल वो फोटो होती है जिसे देखकर लोग वीडियो पर क्लिक करते हैं। अगर थंबनेल जानदार है, तो वीडियो अपने आप चलेगा। गूगल पर  गूगल पर जाकर सर्च करो कि "आजकल लोग क्या देखना पसंद कर रहे हैं", और उसी टॉपिक पर वीडियो बनाना शुरू कर दो।

​एक और बात जो बहुत लोग नहीं बताते—कंटेंट का मालिक आप खुद होने चाहिए। किसी और का गाना या वीडियो उठाकर डालोगे, तो यूट्यूब आपका चैनल बंद कर देगा। हमेशा अपनी मेहनत का ओरिजिनल माल डालो। अगर आप गांव में रहते हैं, तो वहां की ताजी हवा, खेती-बाड़ी और देसी रहन-सहन दिखाओ। आज शहर के लोग ये सब देखने के लिए तरस रहे हैं। इसे 'विलेज व्लॉगिंग' कहते हैं और इसमें बहुत पैसा है। आप  facebook पर भी अपना वही वीडियो डाल सकते हैं, वहां से भी अलग से कमाई होगी। मतलब एक तीर से दो शिकार!

​अंत में बस इतना कहूँगा—यूट्यूब सिर्फ एक ऐप नहीं है, ये एक मौका है अपनी गरीबी मिटाने का और अपनी पहचान बनाने का। आज आपके पास कोई काम नहीं है, तो मायूस मत होइए। अपना फोन उठाइए, धूप में निकलिए और कुछ ऐसा रिकॉर्ड कीजिए जो लोगों के काम आए या उन्हें खुशी दे। याद रखिए, हर बड़ा यूट्यूबर कभी जीरो सब्सक्राइबर पर था। उन्होंने बस हार नहीं मानी। अगर आप भी ठान लें, तो अगले साल इसी वक्त आप अपना 'सिल्वर प्ले बटन' हाथ में लेकर अपनी सफलता का जश्न मना रहे होंगे। तो क्या सोच रहे हो? चैनल का नाम क्या रखोगे, ये अभी कमेंट में बताओ या सोचना शुरू करो, क्योंकि आपकी डिजिटल दुकान खुलने का वक्त आ गया है!







फ्रीलांसिंग का असली सच: बिना ऑफिस गए घर बैठे डॉलर में कमाएं, जानिए कैसे आपका हुनर बन सकता है आपकी सबसे बड़ी जागीर

नई दिल्ली/ग्रेटर नोएडा: भाई देखो, अगर तुम्हारे पास कोई ऐसा हुनर है जो तुम कंप्यूटर या मोबाइल पर कर सकते हो, तो समझ लो तुम दुनिया के किसी भी कोने में बैठकर पैसा छाप सकते हो। आज हम बात कर रहे हैं 'फ्रीलांसिंग' की। इसे अपनी देसी भाषा में कहें तो "अपनी मर्जी का मालिक होना"। यानी न कोई बॉस की चिक-चिक, न सुबह 9 से 5 की गुलामी। जब मन किया काम किया, जब मन किया छुट्टी मना ली। 10 साल से इस फ्रीलांसिंग की दुनिया में धक्के खाने के बाद एक बात समझ गया हूं—दुनिया को इस बात से मतलब नहीं है कि तुम्हारे पास कितनी बड़ी डिग्री है, दुनिया को बस इस बात से मतलब है कि तुम उनका काम कितनी सफाई से कर सकते हो। अगर तुम फोटो अच्छी एडिट कर लेते हो, वीडियो बढ़िया काट लेते हो या फिर कंप्यूटर की कोडिंग जानते हो, तो  upwork जैसी वेबसाइट्स पर गोरे (विदेशी क्लाइंट) तुम्हें डॉलर देने के लिए कतार में खड़े हैं।

​अब जरा ध्यान से समझो, ये फ्रीलांसिंग का चक्कर चलता कैसे है। मान लीजिए आपको फोटो साफ करना या किसी का पोस्टर बनाना आता है, जिसे हम 'ग्राफिक डिजाइनिंग' कहते हैं। अब अमेरिका में बैठे किसी बंदे को अपनी दुकान के लिए एक लोगो (Logo) बनवाना है। वहां के हिसाब से अगर वो किसी बड़ी कंपनी के पास जाएगा, तो वो उससे 50,000 रुपये मांगेंगे। लेकिन वही काम आप उसे  fiverr पर सिर्फ 5,000 रुपये में करके दे देते हो। उसके लिए ये बहुत सस्ता है और आपके लिए घर बैठे 5,000 रुपये एक दिन की बढ़िया कमाई है। इसे ही कहते हैं फ्रीलांसिंग का जादू—काम वही, बस करने का तरीका डिजिटल। चाहे आप लिखना जानते हों (कंटेंट राइटिंग) या वेबसाइट बनाना, हर चीज की मार्केट में जबरदस्त मांग है। लोग आज  linkedin पर प्रोफेशनल प्रोफाइल बनाकर बड़े-बड़े प्रोजेक्ट्स उठा रहे हैं।

अब ध्यान से समझना, अगर तुम दिन भर में सिर्फ दो रील भी निपटा लेते हो—जिसमें तुम्हें मुश्किल से तीन-चार घंटे लगेंगे—तो तुम्हारी एक दिन की दिहाड़ी बन गई सीधे दो हजार रुपये। अब महीने के तीस दिन में से अगर तुम चार-पाँच दिन दोस्तों के साथ मौज-मस्ती भी कर लो, तो भी महीने के आखिर में तुम्हारी जेब में साठ हजार रुपये के करीब शुद्ध मुनाफा बचेगा। अब मुझे बताओ, तुम्हारे शहर में कौन सा ऐसा सरकारी दफ्तर या कंपनी है जो शुरू में ही तुम्हें साठ हजार की गड्डी हाथ में थमा देगी?

​लेकिन असली मज़ा तो तब आता है जब तुम थोड़े मंझे हुए खिलाड़ी बन जाते हो और  freelancer जैसी साइट्स पर जाकर 'गोरे' क्लाइंट्स को पकड़ते हो। अब उन विदेशियों के लिए सौ डॉलर—जो हमारे यहाँ के लगभग साढ़े आठ हजार रुपये होते हैं—वो उनके लिए एक पिज्जा पार्टी जैसा है। वो तुम्हें एक ढंग का वीडियो एडिट करने के साढ़े आठ हजार रुपये एक बार में दे देंगे। अब जरा सोचो, अगर पूरे महीने की भागदौड़ में तुमने सिर्फ दस ऐसे वीडियो भी सेट कर लिए, तो तुम्हारी महीने की कमाई पचासी हजार के पार निकल जाएगी



​लेकिन भाई, अब थोड़ा कड़वा सच (Reality) भी जान लो। फ्रीलांसिंग कोई 'अलादीन का चिराग' नहीं है कि आज शुरू किया और कल से पैसे बरसने लगेंगे। शुरू के दो-तीन महीने आपको एक भी क्लाइंट नहीं मिलेगा। आपको अपनी एक 'पोर्टफोलियो' यानी अपने काम का नमूना तैयार करना होगा। जब तक क्लाइंट को यकीन नहीं होगा कि आप उसका काम कर सकते हैं, वो आपको फूटी कौड़ी नहीं देगा। आपको अपनी इंग्लिश थोड़ी ठीक करनी पड़ेगी या फिर गूगल ट्रांसलेट का सहारा लेना पड़ेगा ताकि आप विदेशी क्लाइंट से बात कर सकें। अक्सर लोग   behance पर अपना काम दिखाते हैं ताकि पूरी दुनिया उसे देख सके। फ्रीलांसिंग में सबसे बड़ी दिक्कत ये है कि काम कभी बहुत ज्यादा होता है और कभी बिल्कुल नहीं। इसलिए आपको पैसे बचाकर रखने की आदत डालनी होगी।

​अब एक खास बात—अगर आप अनपढ़ हैं या ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं हैं, तो भी आप फ्रीलांसिंग कर सकते हैं। कैसे? 'डाटा एंट्री' या 'वर्चुअल असिस्टेंट' बनकर। इसमें बस आपको किसी की एक्सेल शीट भरनी होती है या उनके ईमेल का जवाब देना होता है। ये काम आप  toptal जैसी साइट्स पर ढूंढ सकते हैं। बस आपके पास एक लैपटॉप और तेज इंटरनेट होना चाहिए। लोग आज फेसबुक ग्रुप्स और व्हाट्सएप के जरिए भी लोकल क्लाइंट्स ढूंढ रहे हैं। अगर आप शहर के किसी स्कूल या जिम के लिए छोटा सा विज्ञापन बना देते हैं, तो वो भी फ्रीलांसिंग ही है। आपको बस अपनी नजरें खुली रखनी हैं कि किसे आपकी जरूरत है।







शिक्षा का नया अवतार: ट्यूशन और ऑनलाइन कोर्स से घर बैठे कमाएं मोटा पैसा, जानिए कैसे आपकी जानकारी बन सकती है नोट छापने की मशीन

नई दिल्ली/प्रयागराज: भाई देखो, दुनिया में सब कुछ रुक सकता है, खाना-पीना कम हो सकता है, लेकिन औलाद की पढ़ाई कभी नहीं रुकती। एक बाप भले ही खुद फटे कपड़े पहन ले, लेकिन वो अपने बच्चे को ट्यूशन भेजने के लिए पैसे जरूर जुटाता है। इसी को कहते हैं 'एजुकेशन बिजनेस'। आज हम इसी धंधे की बात कर रहे हैं, जो कभी मंदी नहीं देखता। 10 साल से इस टीचिंग लाइन में रहने के बाद एक बात दावे से कह सकता हूं—अगर तुम्हें कोई भी एक चीज अच्छे से आती है, चाहे वो गणित हो, खाना बनाना हो, सिलाई-कढ़ाई हो या फिर सरकारी नौकरी की तैयारी, तो तुम गरीब नहीं रह सकते। आज के जमाने में  byjus जैसी बड़ी कंपनियां अरबों की बन गई हैं, क्योंकि उन्होंने समझ लिया कि ज्ञान बेचना सबसे पवित्र और सबसे ज्यादा मुनाफे वाला काम है। अब वो जमाना गया जब मास्टर जी को घर-घर जाकर पढ़ाना पड़ता था, अब तो मोबाइल के एक क्लिक पर पूरी दुनिया आपकी क्लास बन सकती है।

​अब जरा ध्यान से समझो, ये खेल दो तरीके से चलता है—एक है 'ऑफलाइन कोचिंग' और दूसरा है 'ऑनलाइन कोर्स'। ऑफलाइन का मतलब है कि आपने अपने मोहल्ले में 10-20 बच्चों को इकट्ठा किया और उन्हें पढ़ाना शुरू कर दिया। लेकिन असली मज़ा और बड़ा पैसा 'ऑनलाइन' में है। मान लीजिए आपको हाईस्कूल का विज्ञान (Science) बहुत अच्छे से आता है। आपने अपने मोबाइल से उसके छोटे-छोटे वीडियो बनाए और उन्हें  यूट्यूब पर डालना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे जब लोग आपको जानने लगेंगे, तब आप अपना एक पूरा कोर्स बना सकते हो। लोग आज  udemy जैसी वेबसाइट्स पर जाकर अपने कोर्स बेच रहे हैं और दुनिया भर के छात्र उन्हें खरीद रहे हैं। आपको बस एक बार मेहनत करके वीडियो रिकॉर्ड करने हैं, और वो कोर्स ताउम्र बिकता रहेगा। इसे कहते हैं 'पैसिव इनकम'—यानी आप सो रहे हैं और बैंक में पैसा आ रहा है।


अब जरा इस हिसाब को बिल्कुल 'देसी' तरीके से अपने दिमाग में उतारो। मान लो, तुमने एक बढ़िया सा कोर्स तैयार किया, जैसे "अंग्रेजी बोलने का आसान तरीका" या "गणित का भूत भगाओ"। अब तुमने इसकी कीमत रखी बिल्कुल मामूली, सिर्फ चार सौ निन्यानवे रुपये—यानी एक पिज्जा की कीमत से भी कम। अब तुम खुद सोचो, हमारे देश की आबादी 140 करोड़ पार कर चुकी है, हर घर में एक बच्चा है जिसे पढ़ाई में मदद चाहिए।

​अब ध्यान से समझना, अगर तुमने  fashbook या इंस्टाग्राम पर थोड़ा सा भी शोर मचाया और पूरे हिंदुस्तान से सिर्फ एक हजार बच्चों ने भी तुम्हारा वो कोर्स खरीद लिया—जो कि इस विशाल आबादी में समंदर की एक बूंद जैसा है—तो तुम्हारी सीधी कमाई हो गई लगभग पाँच लाख रुपये! और सबसे मजे की बात ये है कि इसमें तुम्हारा कोई बार-बार का खर्चा नहीं है। तुमने एक बार वीडियो रिकॉर्ड किया, एक बार मेहनत की, और वो पाँच लाख की गड्डी तुम्हारी जेब में आ गई।



अब जरा इस हिसाब-किताब को बिल्कुल 'देसी' तरीके से अपने दिमाग में उतारो। मान लो, तुमने एक अपनी खास 'स्पेशल थाली' तैयार की और उसकी कीमत रखी बिल्कुल वाजिब, सिर्फ एक सौ पचास रुपये। अब तुम खुद सोचो, इस एक थाली को तैयार करने में तुम्हारा असली खर्चा कितना आएगा? अगर तुम थोक में सामान लाते हो, तो चावल, दाल, सब्जी, रोटी और बढ़िया मसालों का कुल खर्च करीब चालीस रुपये बैठता है। अब इसमें दस रुपये उस सुंदर से पैकिंग के डब्बे और चम्मच के और जोड़ लो, क्योंकि आज के जमाने में जो दिखता है वही बिकता है।

​अब ध्यान से समझना, असली खेल यहाँ शुरू होता है—स्विगी और जोमैटो वाले अपना लगभग तीस से चालीस रुपये का कमीशन काट लेंगे। यानी एक थाली तैयार होकर ग्राहक तक पहुँचने में तुम्हारा कुल खर्चा हुआ करीब नब्बे रुपये। अब एक सौ पचास में से ये नब्बे रुपये घटा दो, तो एक अकेली थाली पर तुम्हें सीधे साठ रुपये का शुद्ध मुनाफा बच रहा है।

​अब जरा बड़े लेवल पर सोचो, अगर तुमने थोड़ी सी मेहनत की और दिन भर में सिर्फ पचास थाली भी निकाल लीं—जो कि एक छोटे से मोहल्ले के लिए भी कोई बड़ी बात नहीं है—तो तुम्हारी एक दिन की कमाई हो गई सीधे तीन हजार रुपये। महीने का जोड़ोगे तो ये पूरे नब्बे हजार रुपये की तगड़ी रकम बैठती है! और भाई, अगर तुम्हारा स्वाद लोगों की जुबान पर चढ़ गया और दिन के सौ ऑर्डर आने लगे, तो महीने के डेढ़ से दो लाख रुपये तो कहीं नहीं गए। लोग आज  rebelfoods जैसी बड़ी कंपनियों को देख रहे हैं जो बिना किसी बड़े रेस्टोरेंट के सिर्फ 'क्लाउड किचन' चलाकर करोड़ों छाप रही हैं, तो तुम छोटे लेवल से क्यों नहीं शुरू कर सकते?

​लेकिन भाई, अब थोड़ा जमीनी सच (Reality) भी सुन लो। सिर्फ वीडियो डाल देने से कोई कोर्स नहीं खरीदता। छात्र और उनके मां-बाप आप पर भरोसा तब करेंगे जब आप उन्हें कुछ 'फ्री' में सिखाओगे। आपको पहले अपनी काबिलियत साबित करनी होगी। जैसे  खान एकेडमी ने किया—पहले मुफ्त में बढ़िया शिक्षा दी और फिर दुनिया भर में छा गए। इस काम में आपको शुरू में कैमरा के सामने बोलने में झिझक होगी, शायद लोग कहें कि "देखो ये भी मास्टर बन गया", लेकिन आपको डटे रहना है। एजुकेशन में सबसे बड़ी चीज है 'रिजल्ट'। अगर आपके पढ़ाए हुए बच्चे का नंबर अच्छा आ गया या उसे नौकरी मिल गई, तो वो 10 और बच्चों को लेकर आएगा। इसमें आपका विज्ञापन आपके छात्र ही करते हैं।

​अब एक और गजब का तरीका सुनो—'स्किल बेस्ड कोचिंग'। जरूरी नहीं कि आप किताबी पढ़ाई ही करवाओ। अगर आप बहुत अच्छा गिटार बजाते हो, योगा सिखाते हो या फिर आपको मोबाइल रिपेयरिंग आती है, तो आप इसका भी कोर्स बना सकते हो। लोग आज  स्किल शेयर पर जाकर नई-नई चीजें सीख रहे हैं। आज के युवाओं को नौकरी के लिए स्किल्स चाहिए, और अगर आप उन्हें वो सिखा सकते हो, तो वो आपको मुंह मांगी फीस देंगे। आप अपनी क्लासेस को  zoom पर लाइव भी ले सकते हो, जहाँ आप बच्चों के सवालों के जवाब तुरंत दे सको। इससे एक पर्सनल जुड़ाव बनता है और आपकी साख बढ़ती है।

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फूड बिजनेस का असली स्वाद: क्लाउड किचन और रेस्टोरेंट से नोट छापने का फंडा, जानिए कैसे आपकी रसोई बन सकती है नोटों की खान

नई दिल्ली/इंदौर: भाई देखो, दुनिया में चाहे कितनी भी मंदी आ जाए, शेयर बाजार गिर जाए या सुनामी आ जाए, इंसान खाना खाना कभी बंद नहीं करेगा। पेट की आग बुझाने का धंधा दुनिया का सबसे पुराना और सबसे पक्का धंधा है। 10 साल से इस खाने-पीने की लाइन में खाक छानने के बाद एक बात डंके की चोट पर कह सकता हूँ—अगर तुम्हारे हाथ के स्वाद में दम है और खिलाने की नीयत साफ है, तो तुम्हें अमीर बनने से कोई नहीं रोक सकता। आज वो जमाना गया जब होटल खोलने के लिए शहर के सबसे महंगे चौराहे पर करोड़ों की दुकान चाहिए होती थी। अब तो खेल 'क्लाउड किचन' का है, यानी अपनी घर की रसोई से ही खाना बनाओ और पूरे शहर को खिलाओ।  जोमैटो और  swiggy जैसे ऐप्स ने छोटे से छोटे हलवाई और घरेलू महिला को भी बड़ा बिजनेसमैन बनने का मौका दे दिया है। बस आपके खाने की खुशबू मोबाइल की स्क्रीन के जरिए लोगों की भूख जगा दे, फिर देखो कैसे ऑर्डर्स की लाइन लगती है।

​अब जरा ध्यान से समझो, ये क्लाउड किचन बला क्या है। मान लो तुम्हें बिरयानी या फिर घर जैसा दाल-चावल बहुत लाजवाब बनाना आता है। अब तुम्हें कोई आलीशान रेस्टोरेंट खोलने की जरूरत नहीं है जहाँ वेटर हों या AC लगा हो। तुम अपने घर के पिछले कमरे में एक साफ-सुथरी रसोई बनाओ और उसका नाम रख दो 'माँ के हाथ का स्वाद'। बस एक FSSAI का लाइसेंस लो, जो कि  fssai पर जाकर आसानी से मिल जाता है, और अपनी किचन को ऑनलाइन ऐप्स पर रजिस्टर कर दो। अब जैसे ही कोई अपने फोन पर 'Best Food Near Me' सर्च करेगा, उसे तुम्हारी फोटो दिखेगी। इसमें तुम्हारा सारा खर्चा सिर्फ कच्चा माल (सब्जी, मसाले) और पैकिंग पर होगा। न कोई भारी किराया, न वेटर की सैलरी। आज लोग बाहर जाने के बजाय  eatclub जैसी साइट्स से घर बैठे ऑर्डर करना ज्यादा पसंद करते हैं, और यही तुम्हारे लिए कमाई का सबसे बड़ा मौका है।

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अब जरा उस कमाई के गणित पर गौर फरमाते हैं जो किसी भी आम आदमी को इस व्यवसाय का दीवाना बना सकता है। मान लीजिए आपने एक विशेष थाली तैयार की जिसकी बाजार में कीमत आपने 150 रुपये तय की है। अब इस थाली को तैयार करने के पीछे के खर्चों का लेखा-जोखा देखें तो चावल, दाल, सब्जी, रोटी और मसालों की लागत करीब 40 रुपये बैठती है, जबकि पैकिंग सामग्री जैसे डब्बा और चम्मच पर 10 रुपये का खर्च आता है। इसके साथ ही स्विगी और जोमैटो जैसे ऑनलाइन डिलीवरी प्लेटफॉर्म अपना कमीशन काटेंगे जो लगभग 30 से 40 रुपये के बीच रहता है। यानी कुल मिलाकर एक थाली तैयार करने और ग्राहक तक पहुँचाने में आपका कुल खर्च 90 रुपये के आसपास सिमट जाता है। अब यदि 150 रुपये की बिक्री में से 90 रुपये का कुल खर्चा घटा दिया जाए, तो आपको प्रति थाली 60 रुपये का शुद्ध मुनाफा प्राप्त होता है। अब जरा बड़े स्तर पर विचार कीजिए, यदि आप दिन भर में महज 50 थालियाँ भी बेचने में सफल रहते हैं, तो आपकी दैनिक आमदनी 3,000 रुपये सुनिश्चित हो जाती है, जो महीने के अंत में पूरे 90,000 रुपये का भारी-भरकम आंकड़ा छू लेती है। और यदि आपके हाथों का स्वाद लोगों की जुबान पर चढ़ गया और रोजाना के ऑर्डर बढ़कर 100 तक पहुँच गए, तो महीने के 1.5 से 2 लाख रुपये की कमाई कहीं नहीं गई



​लेकिन भाई, अब थोड़ा कड़वा और जरूरी सच (Reality) भी सुन लो। फूड बिजनेस में 'स्वाद' ही सब कुछ नहीं होता, 'साफ-सफाई' और 'समय' भी बहुत मायने रखता है। अगर तुमने बासी खाना भेजा या पैकिंग गंदी हुई, तो कस्टमर  google पर जाकर ऐसी रेटिंग देगा कि तुम्हारी दुकान बंद होने की नौबत आ जाएगी। इस धंधे में तुम्हें सुबह की मंडी से लेकर रात के आखिरी ऑर्डर तक एक्टिव रहना पड़ता है। छुट्टी का तो भूल ही जाओ, क्योंकि जिस दिन त्योहार होता है, उसी दिन सबसे ज्यादा काम होता है। और हां, शुरुआत में तुम्हें थोड़ा विज्ञापन भी करना पड़ेगा, जैसे फेसबुक या इंस्टाग्राम पर अपने खाने की सुंदर फोटो डालना।  fashbook पर लोकल ग्रुप्स में अपने मेनू को शेयर करो ताकि तुम्हारे पड़ोसियों को पता चले कि पास में ही इतना बढ़िया खाना मिल रहा है।

​एक और गजब का तरीका है—'सब्सक्रिप्शन मॉडल'। जैसे ऑफिस जाने वाले लोग या बाहर रहकर पढ़ने वाले छात्र रोज बाहर का तला-भुना नहीं खा सकते। तुम उनके साथ महीने का फिक्स सौदा कर लो कि भाई मैं तुम्हें रोज दोपहर और रात का सादा और पौष्टिक खाना खिलाऊंगा और महीने के 4,000 रुपये लूंगा। अगर तुमने सिर्फ 50 ऐसे पक्के ग्राहक बना लिए, तो 2 लाख रुपये महीना तो तुम्हारी पक्की इनकम हो गई। इसमें न तो ऐप्स को कमीशन देना है और न ही किसी और को हिस्सा। ये पैसा सीधा तुम्हारी जेब में। पेमेंट के लिए तुम  पेटीएम या गूगल पे का इस्तेमाल करो ताकि हिसाब-किताब में कोई लफड़ा न हो। आज कल लोग सेहत के लिए भी बहुत जागरूक हो रहे हैं, तो अगर तुम 'हेल्दी डाइट' या 'सब्जी वाली सलाद' जैसा कुछ शुरू करो, तो और भी बढ़िया है।

​मेरी 10 साल की इस लाइन की सबसे बड़ी सीख यही है—कभी भी क्वालिटी से समझौता मत करना। अगर घी असली बोला है तो असली ही डालना, क्योंकि जुबान को धोखा नहीं दिया जा सकता। जब कोई तुम्हारा खाना खाकर तृप्त होता है और कहता है "भाई मजा आ गया", तो वो सिर्फ पैसे नहीं देता, वो दुआएं भी देता है जो तुम्हारे बिजनेस को बरकत देती हैं। तुम  NDTV जैसी वेबसाइट्स पर जाकर देख सकते हो कि कैसे छोटे-छोटे ढाबे आज बड़े ब्रांड बन चुके हैं। उनकी सफलता का राज बस यही था—ईमानदारी और मेहनत। अगर तुम भी धूप में पसीना बहाने और रसोई की गर्मी सहने को तैयार हो, तो ये धंधा तुम्हें वो ऐशो-आराम देगा जो किसी भी बड़ी नौकरी में नहीं है।

​तो भाई, कब तक दूसरों की रसोई में काम करोगे या फालतू बैठोगे? अपनी खुद की कड़ाही चढ़ाओ, मसालों का डिब्बा खोलो और शुरू कर दो अपना खुद का 'फूड किंगडम'। याद रखना, दुनिया के सबसे अमीर शेफ भी कभी एक छोटे से चूल्हे से ही शुरू हुए थे। तुम्हारी सफलता का रास्ता तुम्हारी रसोई से होकर गुजरता है। बस एक बार अपने स्वाद पर भरोसा करो और कूद पड़ो इस मैदान में। कल जब तुम्हारे हाथ का खाना पूरे शहर की पहली पसंद बनेगा, तब तुम्हें समझ आएगा कि मैंने ये बात क्यों कही थी।

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ट्रांसपोर्ट और लॉजिस्टिक्स का असली खेल: चक्के घूमेंगे तो लक्ष्मी बरसेगी, जानिए कैसे ट्रकों और डिलीवरी के धंधे में छिपा है करोड़ों का मुनाफा

नई दिल्ली/लुधियाना: भाई देखो, अगर तुम चारों तरफ नजर घुमाकर देखोगे, तो तुम्हें हर चीज—चाहे वो हाथ में पकड़ा मोबाइल हो, घर का राशन हो या बदन के कपड़े—सब कुछ किसी न किसी ट्रक या टेंपो में लदकर ही तुम तक पहुँचा है। 10 साल से इस ट्रांसपोर्ट की लाइन में धूल फांकने और गाड़ियां दौड़ाने के बाद एक बात डंके की चोट पर कह सकता हूँ—जब तक दुनिया में सामान बनेगा और बिकेगा, तब तक ट्रांसपोर्ट का धंधा कभी मंदा नहीं होगा। इसे अपनी देसी भाषा में 'लॉजिस्टिक्स' कहते हैं, जिसका सीधा मतलब है सामान को एक जगह से उठाकर सही सलामत दूसरी जगह पहुँचाना। बहुत से लोग डरते हैं कि भाई इसमें तो बहुत रिस्क है, एक्सीडेंट हो गया तो क्या होगा? पर सच तो ये है कि अगर तुम इसे सिस्टम से करो, तो  vrlgroup जैसी बड़ी कंपनियों की तरह तुम भी अपना साम्राज्य खड़ा कर सकते हो। आज के दौर में इंटरनेट ने इस काम को इतना आसान कर दिया है कि तुम घर बैठे अपनी गाड़ी के लिए भाड़ा ढूंढ सकते हो।

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​अब जरा ध्यान से समझो, ये खेल चलता कैसे है। इसमें तीन बड़े रास्ते हैं—पहला है 'भारी ट्रक' (Heavy Trucking) जो एक शहर से दूसरे शहर कच्चा माल ले जाते हैं। दूसरा है 'लास्ट माइल डिलीवरी' (Last Mile Delivery), जैसे

जैसे Delhivery या Ecom Express

   या   जैसी कंपनियाँ करती हैं, जो अमेज़न या फ्लिपकार्ट का पैकेट सीधे ग्राहक के घर पहुँचाती हैं। और तीसरा सबसे तगड़ा रास्ता है 'B2B यानी बिजनेस टू बिजनेस'। इसमें तुम किसी फैक्ट्री या बड़ी दुकान से हाथ मिला लेते हो कि भाई तुम्हारा सारा माल हम ही ढोएंगे। इसमें फायदा ये है कि काम पक्का होता है और पैसा हर महीने बंधा-बंधाया मिलता है। अगर तुम्हारे पास खुद की गाड़ी नहीं भी है, तो तुम 'ब्रोकर' बनकर दूसरों की गाड़ियां लगवाकर भी मोटा कमीशन कमा सकते हो।

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Calculation) समझते हैं जो किसी को भी इस व्यवसाय का मुरीद बना सकता है।

​मान लीजिए आपने एक 'छोटा हाथी' (Tata Ace) या कोई टेंपो किस्तों पर लिया है। यदि आप किसी फैक्ट्री के साथ एक दिन का भाड़ा पक्का कर लेते हैं, तो औसतन आपको 2,500 से 3,000 रुपये तक मिल जाते हैं। अब इस कुल कमाई में से खर्चों का हिसाब इस प्रकार बैठता है:

  • डीजल का खर्चा: लगभग 1,000 रुपये
  • ड्राइवर की दिहाड़ी: 500 रुपये
  • गाड़ी की किस्त और मेंटेनेंस: 500 रुपये

​इस हिसाब से सारे खर्चे निकालकर एक दिन में आपके पास 1,000 रुपये का शुद्ध मुनाफा बचता है। यदि महीने में गाड़ी 26 दिन भी चलती है, तो एक छोटी गाड़ी आपको हर महीने 26,000 रुपये कमाकर दे रही है। अब कल्पना कीजिए, यदि आपने धीरे-धीरे विस्तार किया और 5 गाड़ियाँ सड़क पर उतार दीं, तो महीने का सवा लाख रुपये का मुनाफा कहीं नहीं गया।

​यदि आप और बड़े स्तर पर जाते हैं और 10 टायर या 12 टायर वाले बड़े ट्रकों के साथ काम शुरू करते हैं, जहाँ एक-एक फेरे का भाड़ा 50,000 से 1 लाख रुपये तक होता है, तो वहां मुनाफा भी उसी अनुपात में बढ़ जाता है। 


​लेकिन भाई, अब थोड़ा कड़वा और जरूरी सच (Reality) भी सुन लो। ट्रांसपोर्ट का धंधा 'लोहे' का काम है, इसमें जिगर चाहिए। गाड़ी रास्ते में खराब हो सकती है, टायर फट सकता है, या कभी-कभी पुलिस और आरटीओ की चिक-चिक झेलनी पड़ सकती है। सबसे बड़ी सिरदर्दी होती है 'रिटर्न लोड' की, यानी गाड़ी माल लेकर तो गई पर उधर से खाली आ रही है। अगर गाड़ी खाली आई, तो समझो तुम्हारी जेब से पैसा गया। इसीलिए आज के स्मार्ट ट्रांसपोर्टर  blackbuck या  truckguru जैसे ऐप्स का इस्तेमाल करते हैं ताकि वापसी का भाड़ा पहले ही सेट हो जाए। इस धंधे में ड्राइवर सबसे बड़ी कड़ी है—अगर ड्राइवर ईमानदार और पक्का है, तो तुम घर सोओगे और गाड़ी नोट छापेगी।

​एक और गजब का तरीका है—'कूरियर और छोटी डिलीवरी'। आज हर मोहल्ले में लोग ऑनलाइन सामान मंगा रहे हैं। तुम किसी बड़ी कूरियर कंपनी की फ्रेंचाइजी ले लो या अपना खुद का लोकल डिलीवरी नेटवर्क बना लो।  bluedart जैसी बड़ी कंपनियों को आज लोकल लड़कों की जरूरत है जिनके पास अपनी बाइक या ई-रिक्शा हो। इसमें रिस्क कम है और काम हर रोज मिलता है। तुम अपने इलाके के छोटे दुकानदारों से बात कर सकते हो कि भाई तुम्हारा होम डिलीवरी का काम हम संभालेंगे। ये छोटे-छोटे कदम ही कल को एक बड़ी लॉजिस्टिक्स कंपनी की नींव रखते हैं। पेमेंट के लिए हमेशा डिजिटल रहो, ताकि  fastag और तेल के खर्चे का हिसाब साफ रहे।

​मेरी 10 साल की इस लाइन की सबसे बड़ी सीख यही है—गाड़ी की सेहत और ड्राइवर की इज्जत कभी मत भूलना। अगर गाड़ी का इंजन सही है और तेल टाइम पर बदल रहे हो, तो वो तुम्हें कभी रास्ते में धोखा नहीं देगी। और अगर ड्राइवर खुश है, तो वो तुम्हारी गाड़ी को अपनी समझकर चलाएगा। ट्रांसपोर्ट में 'जुबान' की बहुत कीमत है। अगर तुमने वादा किया है कि माल कल सुबह 10 बजे पहुँचेगा, तो वो पहुँचना ही चाहिए। यही भरोसा तुम्हें बड़े-बड़े कॉन्ट्रैक्ट दिलवाएगा। तुम  tata या अशोक लेलैंड की साइट्स पर जाकर नई गाड़ियों और उनके माइलेज के बारे में पढ़ सकते हो ताकि सही फैसला ले सको।

​तो भाई, कब तक दूसरों की गाड़ियों में लदकर चलोगे? अपना खुद का चक्का घुमाओ। शुरुआत एक छोटी गाड़ी या कूरियर सर्विस से करो, पर सपना बड़ा रखो। ट्रांसपोर्ट का धंधा उन्हीं का है जो धूल और धूप से नहीं डरते। जिस दिन तुम्हारी गाड़ियां सड़कों पर दौड़ेंगी और उनका हॉर्न बजेगा, तब तुम्हें समझ आएगा कि इस 'लोहे के व्यापार' में कितनी गर्माहट है। ये सिर्फ सामान नहीं ढोना है, ये देश की तरक्की के पहिये को घुमाना है। अपनी मेहनत और सही नीयत के साथ इस मैदान में उतरो, फिर देखो कैसे सड़कें तुम्हारे लिए सोने का रास्ता बन जाती हैं।





सॉफ्टवेयर और ऐप का असली जादुई धंधा: बिना दुकान और गोदाम के घर बैठे कैसे खड़ा करें करोड़ों का साम्राज्य, जानिए मोबाइल की स्क्रीन से नोट छापने का सीक्रेट

नई दिल्ली/सिलिकॉन वैली: भाई देखो, आज के जमाने में तुम चाहे सो रहे हो, खा रहे हो या सफर कर रहे हो, तुम्हारे हाथ में जो ये मोबाइल है, वही दुनिया की सबसे बड़ी दुकान है। 10 साल से इस कोडिंग और सॉफ्टवेयर की दुनिया में माथापच्ची करने के बाद एक बात समझ गया हूँ—अब वो जमाना गया जब रईस बनने के लिए बड़ी-बड़ी फैक्ट्रियां लगानी पड़ती थीं। अब तो अगर तुम्हारे पास एक ऐसा 'ऐप' (App) है जो लोगों की कोई छोटी सी भी मुसीबत हल कर दे, तो तुम रातों-रात राजा बन सकते हो। इसे अपनी देसी भाषा में 'सॉफ्टवेयर का धंधा' कहते हैं। बहुत से लोग डरते हैं कि भाई हमें तो अंग्रेजी नहीं आती, हमें कंप्यूटर चलाना नहीं आता, तो हम ये कैसे करेंगे? तो मेरा जवाब है—तुम्हें कार चलानी नहीं आती तो क्या तुम कार में बैठते नहीं? बिल्कुल वैसे ही, तुम्हें कोडिंग नहीं आती तो क्या हुआ, तुम काम करने वाले लड़के रख सकते हो या फिर  buildfire जैसी वेबसाइट्स का इस्तेमाल करके बिना कोडिंग के भी अपना ऐप बना सकते हो। आज के दौर में  whatsapp जैसी कंपनी सिर्फ एक ऐप ही तो है, जिसे कुछ लड़कों ने मिलकर बनाया और अरबों में बेच दिया।

​अब जरा ध्यान से समझो, ये ऐप का खेल चलता कैसे है। इसमें दो बड़े रास्ते हैं—पहला है 'मोबाइल ऐप' बनाना, जैसे गेमिंग ऐप, फोटो एडिटिंग या फिर आपके मोहल्ले की डिलीवरी वाला ऐप। दूसरा रास्ता है 'SaaS' (सॉफ्टवेयर एज़ अ सर्विस), जिसका मतलब है ऐसा सॉफ्टवेयर जो लोग महीने का किराया देकर इस्तेमाल करें। इसे एक मिसाल से समझो। मान लो तुम्हारे शहर के सारे राशन दुकानदारों को अपना हिसाब-किताब रखने में दिक्कत होती है। तुमने एक छोटा सा सॉफ्टवेयर बनवा दिया जहाँ वो अपना उधार और स्टॉक लिख सकें। अब वो दुकानदार तुम्हें हर महीने 500 रुपये किराया दे रहा है उस सॉफ्टवेयर को इस्तेमाल करने का। इसे ही कहते हैं 'महीने की बंधी-बंधाई कमाई'। लोग आज  zoho या  tallysolutions जैसी कंपनियों को देख रहे हैं जो बस सॉफ्टवेयर बेचकर हजारों करोड़ कमा रही हैं। तुम भी छोटे स्तर से अपने शहर की किसी समस्या को पकड़कर शुरू कर सकते हो।

​चलिए, अब जरा उस कमाई के गणित (Calculation) पर आते हैं जो तुम्हारे होश उड़ा देगा। मान लो तुमने एक छोटा सा 'कैलकुलेटर' या 'मंडी भाव' बताने वाला ऐप बनाया और उसे  google Play Store (गूगल प्ले स्टोर) पर डाल दिया। अब मान लो पूरे भारत में सिर्फ 1 लाख लोगों ने उसे डाउनलोड कर लिया। अब कमाई के दो तरीके हैं—पहला विज्ञापन (Ads)। अगर 1 लाख लोग रोज तुम्हारा ऐप खोलते हैं, तो गूगल एडसेंस के जरिए तुम महीने के कम से कम 2,000 से 3,000 डॉलर (करीब 1.5 से 2.5 लाख रुपये) आराम से कमा सकते हो। दूसरा तरीका है 'प्रीमियम सर्विस'—मान लो तुमने कहा कि भाई बेसिक ऐप फ्री है, पर खास जानकारी के लिए महीने के सिर्फ 100 रुपये देने होंगे। अगर 1 लाख में से सिर्फ 5,000 लोगों ने भी वो 100 रुपये वाला प्लान ले लिया, तो तुम्हारी हर महीने की पक्की कमाई हुई 5,000 × 100 = 5,00,000 रुपये! और इसमें तुम्हारा रोज का कोई खर्चा नहीं है, एक बार ऐप बन गया तो वो खुद-ब-खुद चलता रहेगा। तुम Appel पर भी अपना ऐप डाल सकते हो जहाँ अमीर ग्राहक ज्यादा पैसे देते हैं।


​लेकिन भाई, अब थोड़ा कड़वा और जरूरी सच (Reality) भी सुन लो। ऐप बनाना जितना आसान है, उसे लोगों तक पहुँचाना उतना ही मुश्किल है। प्ले स्टोर पर करोड़ों ऐप पड़े हैं जिन्हें कोई नहीं पूछता। तुम्हें 'मार्केटिंग' करनी पड़ेगी। और हां, सॉफ्टवेयर में 'बग' (गलतियां) आते रहते हैं, तो तुम्हें उसे बार-बार सुधारना पड़ेगा। बहुत से लोग जोश में आकर ऐप तो बना लेते हैं पर उसे अपडेट नहीं करते, जिससे वो धीरे-धीरे बंद हो जाता है। कोडिंग सीखने के लिए तुम्हें डिग्री की जरूरत नहीं है, तुम  W3schools वया यूट्यूब पर जाकर फ्री में 'Python' या 'Java' जैसी भाषाएं सीख सकते हो। अगर तुम खुद नहीं करना चाहते, तो  fiverr दी पर जाकर किसी फ्रीलांसर से अपना ऐप बनवा सकते हो। बस तुम्हारा आईडिया सॉलिड होना चाहिए।

​एक और गजब का तरीका है—'सफ़ेद लेबल' (White Label) सॉफ्टवेयर। इसमें तुम एक सॉफ्टवेयर बनवाते हो और उसे अलग-अलग कंपनियों को उनके नाम से बेच देते हो। जैसे स्कूल मैनेजमेंट सॉफ्टवेयर। तुमने एक बार बनाया और अपने शहर के 10 स्कूलों को बेच दिया। हर स्कूल तुम्हें सालाना मेंटेनेंस के नाम पर 50,000 रुपये दे रहा है। 10 स्कूलों से साल के 5 लाख रुपये तो वैसे ही हो गए। आज कल लोग  shopity जैसे प्लेटफॉर्म्स के लिए छोटे-छोटे 'प्लगइन्स' बनाकर भी लाखों कमा रहे हैं। ये दुनिया बहुत बड़ी है, और यहाँ हर वो बंदा पैसा बना रहा है जो लोगों का समय बचा रहा है। पेमेंट के लिए तुम  strpe या रेजरपे का इस्तेमाल कर सकते हो जिससे पूरी दुनिया से पैसा तुम्हारे बैंक में आ जाए।

​मेरी 10 साल की इस लाइन की सबसे बड़ी सीख यही है—कभी भी बहुत भारी या मुश्किल ऐप मत बनाओ। शुरू में ऐसा कुछ बनाओ जो बिल्कुल सीधा और सरल हो, जिसे एक छोटा बच्चा भी चला सके। अगर तुम्हारा ऐप चलाने के लिए ट्रेनिंग की जरूरत पड़ रही है, तो समझो वो फेल है।  इंस्टाग्राम की कामयाबी का राज भी यही था—बस फोटो खींचो और डाल दो। तुम्हें भी वही सादगी पकड़नी है। तुम  techcrunch जैसी वेबसाइट्स पर जाकर पढ़ सकते हो कि दुनिया के नए स्टार्टअप्स क्या कर रहे हैं और वहां से आईडिया ले सकते हो। सॉफ्टवेयर का धंधा 'दिमाग' का धंधा है, यहाँ पसीना कम और बुद्धि ज्यादा खर्च करनी पड़ती है।

​तो भाई, कब तक सिर्फ दूसरों के ऐप पर रील देखोगे और अपना डेटा फूंकोगे? अब वक्त है खुद का कुछ ऐसा बनाने का जिसे दुनिया देखे। अपनी एक छोटी सी टीम बनाओ या खुद सीखना शुरू करो। शुरुआत में शायद तुम्हें लगे कि ये बहुत कठिन है, पर एक बार जब पहला डॉलर तुम्हारे खाते में आएगा, तो वो खुशी तुम्हें रुकने नहीं देगी। याद रखना, आज का दौर डिजिटल क्रांति का है और इस क्रांति का सबसे बड़ा हथियार है 'कोडिंग'। अपनी मेहनत और सही विजन के साथ इस मैदान में उतरो, फिर देखो कैसे मोबाइल की एक छोटी सी स्क्रीन तुम्हारे लिए करोड़ों का रास्ता खोल देती है। ये सिर्फ ऐप नहीं, ये तुम्हारी डिजिटल जागीर है जो सालों-साल तुम्हें कमाई करके देगी।





शेयर बाजार का असली सच: सट्टा नहीं, समझदारी का खेल—जानिए कैसे कौड़ियों के शेयर आपको बना सकते हैं करोड़पति, पर एक गलती कर सकती है कंगाल

नई दिल्ली/मुंबई: भाई देखो, अगर तुमने कभी मोहल्ले की दुकान पर बैठकर सुना होगा कि "फलाने ने शेयर बाजार में पैसा लगाया और बर्बाद हो गया," तो समझ लो उसने जुआ खेला था, धंधा नहीं। 10 साल से इस दलाल स्ट्रीट की उठापटक देखने के बाद एक बात डंके की चोट पर कह सकता हूँ—शेयर मार्केट (Share Market) अलादीन का चिराग भी है और जलता हुआ अंगारा भी। अगर इसे सीखकर हाथ लगाओगे, तो पुश्तें तर जाएंगी, और अगर बिना सोचे कूदे, तो तन के कपड़े भी बिक जाएंगे। आसान भाषा में समझो, शेयर बाजार का मतलब है किसी चलती-फिरती कंपनी में 'हिस्सेदार' बनना। मान लो  tata एक बहुत बड़ी गाड़ी बनाने वाली कंपनी है। तुमने उसके कुछ 'शेयर' खरीद लिए, तो अब तुम भी टाटा के छोटे से मालिक बन गए। जब कंपनी तरक्की करेगी, तो तुम्हारा पैसा भी बढ़ेगा। आज के दौर में  zerdha या  groww जैसे ऐप्स ने इसे इतना आसान बना दिया है कि तुम अपने अंगूठे के एक क्लिक से रिलायंस या इन्फोसिस के मालिक बन सकते हो।

​अब जरा ध्यान से समझो, ये खेल चलता कैसे है। इसमें दो बड़े रास्ते हैं—पहला है 'इन्वेस्टमेंट' (Investment), यानी पैसा लगाकर भूल जाओ। जैसे तुमने आज एक आम का पेड़ लगाया, तो वो कल फल नहीं देगा, पर 10 साल बाद तुम्हें और तुम्हारी अगली पीढ़ी को मीठे फल खिलाएगा। दूसरा रास्ता है 'ट्रेडिंग' (Trading), जिसे हम 'रोज की दिहाड़ी' कह सकते हैं। इसमें तुम सुबह शेयर खरीदते हो और शाम तक मुनाफा लेकर निकल जाते हो। इसे 'इंट्राडे' कहते हैं। लोग आज   moneycontrol पर जाकर देखते हैं कि कौन सा शेयर ऊपर जा रहा है और उसी पर दांव लगाते हैं। लेकिन याद रखना, ट्रेडिंग में रिस्क बहुत ज्यादा है। अगर तुम्हें तैरना नहीं आता, तो गहरे समंदर में उतरना बेवकूफी है।

​चलिए, अब जरा उस कमाई के गणित (Calculation) पर आते हैं जो तुम्हारी आँखें खोल देगा। मान लो तुमने आज से 10-15 साल पहले किसी अच्छी कंपनी, जैसे 'आयशर मोटर्स' (जो बुलेट बाइक बनाती है), उसमें सिर्फ 10,000 रुपये लगाए होते। उस समय एक शेयर की कीमत बहुत कम थी। आज वही 10,000 रुपये बढ़कर करोड़ों में तब्दील हो चुके होते। इसे कहते हैं 'कंपाउंडिंग' की ताकत। अब रोज की कमाई का हिसाब देखो—मान लो तुम्हारे पास 50,000 रुपये हैं और तुम 'ऑप्शन ट्रेडिंग' (Option Trading) कर रहे हो। अगर तुमने सही चार्ट पढ़ना सीख लिया, तो 50,000 लगाकर तुम एक दिन में 5,000 से 10,000 रुपये भी कमा सकते हो। लेकिन—और ये बहुत बड़ा 'लेकिन' है—अगर बाजार तुम्हारे खिलाफ चला गया, तो वो 50,000 रुपये शाम तक 5,000 भी रह सकते हैं। इसीलिए  nseindia वेबसाइट पर जाकर पहले डेटा पढ़ना सीखो, हवा में तीर मत चलाओ।

​लेकिन भाई, अब थोड़ा कड़वा और जरूरी सच (Reality) भी सुन लो। शेयर मार्केट में 90% लोग अपना पैसा गंवाते हैं। क्यों? क्योंकि वो 'लालच' में आते हैं। वो देखते हैं कि पड़ोसी ने 1 लाख का 2 लाख बना लिया, तो वो भी अपना खेत या जेवर बेचकर पैसा लगा देते हैं। ये सबसे बड़ी गलती है। शेयर बाजार में हमेशा वही पैसा लगाओ जिसे तुम खोने की हिम्मत रखते हो। कभी भी 'लोन' लेकर या उधार लेकर ट्रेडिंग मत करना, वरना डिप्रेशन का शिकार हो जाओगे। सीखने के लिए तुम  investopedia जैसी साइट्स का सहारा ले सकते हो जहाँ शेयर मार्केट की ए-बी-सी-डी सिखाई जाती है। जब तक तुम्हें 'कैंडलस्टिक' और 'सपोर्ट-रेजिस्टेंस' का मतलब न पता चले, तब तक बड़ा हाथ मत मारना।

​एक और गजब का और सुरक्षित तरीका है—'SIP' (सिस्टमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान)। इसे हम 'डिजिटल गुल्लक' कह सकते हैं। तुम हर महीने सिर्फ 500 या 1,000 रुपये किसी अच्छे 'म्यूचुअल फंड' में डालो। म्यूचुअल फंड का मतलब है कि तुमने अपना पैसा एक एक्सपर्ट को दे दिया जो तुम्हारे बदले शेयर बाजार में पैसा लगाएगा।  amfindia पर जाकर तुम देख सकते हो कि पिछले 20 सालों में म्यूचुअल फंड ने लोगों को मालामाल कर दिया है। इसमें रिस्क कम है और लंबे समय में मोटा पैसा बनने की पूरी गारंटी है। अगर तुम अनपढ़ हो या बाजार की समझ नहीं है, तो ये रास्ता तुम्हारे लिए सबसे बेस्ट है। बस एक बार खाता खुलवाओ और भूल जाओ, 20 साल बाद तुम करोड़पति बनकर निकलोगे।

​मेरी 10 साल की इस पंक्ति की सबसे बड़ी सीख यही है—बाजार हमेशा सही होता है, हम गलत होते हैं। जब बाजार गिर रहा हो, तो डरो मत, वो 'सेल' लगी है सामान सस्ते में। और जब बाजार आसमान छू रहा हो, तो सावधान हो जाएं। लोग बार-बार प्रमाणित करते हैं—जब सब चिल्लाते हैं "बाज़ारी मैदान," तब वो सिद्धांत हैं और जब गिरता है, तो डरकर बेच देते हैं। क्षुद्रग्रह पर आधारित है। अपनी भावनाओं पर विश्वास रखना ही इस आतंकवादी की सबसे बड़ी जीत है। आप   बीएसईइंडिया पर रियल एस्टेट कंपनी की पुरानी कुंडली की जांच कर सकते हैं कि वे पिछले वर्ष में कितने साल पहले कामया करेंगे। जो कंपनी रिवॉर्ड कमा रही है, उसका शेयर आज नहीं तो कल वैल्यूएशन ही।

​तो भाई, कब तक बैंक के 5-6% ब्याज पर खुश रहेंगे? तेजी से बढ़ रही है, और उस अनुपात को सिर्फ शेयर बाजार ही मत दे सकते हैं। लेकिन फिर कह रहा हूं- ये कोई 'लक्ष्मी चित फैन' नहीं है कि 21 दिन में पैसा डबल हो जाए। ये एक तपस्या है. पहले सीखो, छोटे-छोटे निवेश से शुरू करो, और फिर देखो पैसे से पैसा कैसे बनता है। मेहनत की कमाई बहुत कीमती है, इसे सट्टे में मत उड़ाओ। अगर तुम सही रास्ते पर चलो, तो   टिकरटेप जैसे टूल्स स्थापित करने में मदद करेंगे। याद रखें, शेयर मार्केट में धीरज रखने वाला ही अंत में जीता है। किस्मत को कोसना छोड़ो और खुद को इतना काबिल बनाओ कि चार्ट देखते ही संकटमोचनों की गड्डी नजर आने लगे।

​क्या आप जानना चाहते हैं कि अपना पहला शेयर कैसे प्रदर्शित करें? या फिर आने वाले समय में किस सेक्टर में सबसे ज्यादा तेजी से बढ़ोतरी होनी चाहिए?

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